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जीन क्रांति का खुलासा
मानव को छोड़कर सृष्टि में विद्यमान करोड़ों
जीव—जंतुओं की प्रजातियों में ऐसा कोई नहीं है जो अपने अस्तित्व को बनाए
रखने हेतु बाजार पर आश्रित हो। सभ्यता के विकास के साथ—साथ समुदाय के
भौतिक संसाधनों और उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार कायम करके मानव जाति का
छोटा सा समुदाय अकूत धन—सम्पदा एकत्र करने को होड़ में लग गया।
मजदूर और किसानों का शोषण कर उसे नारकीय जीवन की ओर ढकेलने के बाद यह
वर्ग अपनी सुख, सुविधाओं और अययाशी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार
रहता है। ये बड़े पूंजीपति ही आज संसार पर शासन कर रहे है। सभी देशों के
शासक वर्ग इन पूंजीपतियों के वफादार नौकर की तरह काम करते हैं। राजसत्ता
का प्रयोग इन धन्नासेठों के द्वारा संचालित कार्पोरेट्स को अधिकाधिक लाभ
पहुंचाने के लिए किया जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जनता के मतों से सरकार का गठन होता है।
इसलिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे शब्दों का बहुतायत में प्रयोग
किया जाता है किन्तु इन शब्दों का व्यवहार में कभी प्रयोग नहीं होता।
पूंजीवाद के प्रारंभिक दौर में मेहनतकशों का शोषण करके मुनाफा कमाया जाता
था। बैंकिग, बीमा जैसी संस्थाओं का प्रादूर्भाव हुआ तो मुनाफा कमाने के
नए रास्ते खुले, अब स्टॉक के माध्यम के रातों—रात खरबों रूपये का
वारा—न्यारा होने लगा और चंद पूंजीवाद घरानों के पास कई देशों के सकल
घरेलू उत्पाद से भी अधिक धन एकत्र हो गया। इस पूंजी का इस्तेमाल उपभोक्ता
सामग्री के उत्पादन में किया जाने लगा और रिटले बिक्री के धंधे में
बिचौलियों को हटाकर मॉल, बिग—बाजार के माध्यम से एकाधिकार बनाया जा रहा
है। विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, एशियन विकास बैंक जैसी संस्थाएं
सरकारों पर दबाव डालकर उपभोक्ता सामग्री और आवारा पूंजी की बेरोकटोक
आवा—जाही के लिए ढांचागत सुधार के काम में लग गई। भारत जैसे विकासशील
देशों में अपने हित संवर्धन के अनुकूल वातावरण बनाने हितैषी सरकारों की
ताजपोशी कराई गई। ये सरकारें अब आवारा पूंजी के लिए अपने देशों में
स्थायी धंधे के नए द्वार खोलने में लगी हैं। भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा,
जल, ऊर्जा, आवास और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निजी निवेश का मार्ग
तभी खुलेगा जब सरकारें इन क्षेत्रों से अपने हाथ खींच लेंगी। भारत की
राजनीति और अर्थनीति वर्तमान में इसी दौर से गुजार रही है।
पहली हरित क्रांति के बहाने 35 वर्ष पूर्व भारत की खेती किसानी में बाजार
की घुसपैंठ हो गई। किसानी घाटे का सौदा बन जाने के कारण लाखों पहली हरित
क्रांति के बहाने 35 वर्ष पूर्व भारत की खेती किसानी में बाजार की
घुसपैंठ हो गई। किसानी घाटे का सौदा बन जाने के कारण लाखों किसानों ने
आत्महत्या कर ली। अमेरीका में भी किसानों के साथ यही घटित हुआ था। जॉन
स्टेनबक ने ग्रेप्स ऑफ रैथ पुस्तक में वहां के किसानों की त्रासदी को
बहुत संवेदना के साथ लिखा। इस पुस्तक पर उन्हें नोबेल पुरस्कार भी दिया
गया। भारत में अब किसानी को पूरी तरह से कार्पोरेट की गिरफ्त में डालने
के लिए दूसरी हरित क्रांति के झांसे में फसाने की पूरी तैयारी हो गई है।
प्राकृतिक तौर पर किसान अपने बीज खुद तैयार कर लेता था। अब बीजों पर
धंधेबाजों का एकाधिकार कायम करने जीन क्रांति के द्वार खोले जा रहे हैं।
बीटी कपास के बाद अब बैंगन, धान, चना, तंबाखू, सरसों, टमाटर, फूलगोभी,
मिर्च, केला, बंदगोभी, खरबूजा, अरहर, गेहूं, संतरे और मूंगफली के जीन
संवर्धित बीज भारत के किसानों को बेचकर अकूत धन कमाने का खेल प्रारंभ हो
गया है। सरकारें इस काम में पूरी तरह मददगार बन गई है।
जैनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी से अनुमति प्राप्त करने की औपचारिकता
पूरी कर ली जाएगी भले ही जी.एम.उत्पादों के उपयोग से तरह—तरह के रोग पैदा
हो जाएं। दवा उद्योगों को बढ़ावा देने रोगों को बढ़ाने की भी अंदरूनी नीति
होती है। मोन्सेन्टो, सिन्जेन्टा, डॅयू—पांट, डाऊ, बायर तथा बी.ए.एफ.
कम्पनियां बीजों के कभी न खत्म होने वाले धंधे में पूरी तरह से अपना पैर
जमा चुकी हैं। उनके व्यापारिक हितों का संरक्षण और संवर्धन करना भारत
सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता वाला कार्य हो गया है। नई क्रांति भारत
की परम्परागत किसानी और लघु तथा सीमान्त किसानों के खात्मे का पैगाम लेकर
आ चुकी है। सावधान...
लेखक— जयंत वर्मा
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