ईसा पूर्व 600 से छठी शताब्दी ईस्वी तक के सिक्कों की कहानी पर केन्द्रित प्रदर्शनी

Location: Bhopal                                                 👤Posted By: PDD                                                                         Views: 240

Bhopal: 27 मार्च 2017, मौर्य काल, कुषाण काल से होते हुए गुप्त काल की ताम्र, रजत एवं स्वर्ण मुद्राएँ भारतीय इतिहास की कहानी बताती हैं। संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय ने ईसा पूर्व 600 से 6वीं शताब्दी ईस्वी तक के प्रचलित सिक्कों के छायाचित्र के जरिये धार्मिक, सांस्कृतिक मान्यताओं, परम्पराओं को परिचित करवाने के उद्देश्य से "सिक्कों की कहानी" छायाचित्र प्रदर्शनी श्यामला हिल्स स्थित राज्य संग्रहालय में लगायी है। प्रदर्शनी 27 मार्च से 5 अप्रैल तक सुबह 10.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुली रहेगी।

पुरातत्व आयुक्त श्री अनुपम राजन ने सिक्कों की कहानी का इतिहास बताते हुए कहा कि भारतीय व्यापार में सिक्के ईसा पूर्व भी चलन में थे। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आसपास सिक्कों के चलन की शुरूआत हुई थी। अपनी अनूठी निर्माण शैली के कारण शुरूआती सिक्कों को 'पंचमार्क' (आहत मुद्रा) कहा जाता था। आहत मुद्राओं का निर्माण 4वीं शती ई. पूर्व में अलेक्जेंडर द ग्रेट के आक्रमण के पहले किया जाने लगा था। इन्हें पुराण, कर्षापण या पाना कहा जाता था। जिन सिक्कों को केवल एक ही पंच द्वारा निर्मित किया जाता था, उनमें एक ही प्रतीक होता था। सौराष्ट्र के सिक्कों में कूबड़दार बैल, पांचाल में स्वस्तिक का चिन्ह इसके उदाहरण हैं। ये सिक्के अधिकतर एक मानक वजन की चाँदी के बने होते थे, जिन्हें वांछित सटीक वजन में कटौती कर बनाया जाता था।

श्री राजन ने बताया कि आहत मुद्राओं में अंकित प्रभावी चिन्हों में मुख्यत: सूर्य, वृषभ, नंदी, हाथी, उज्जयिनी चिन्ह, नंदीपाद चिन्ह, वृक्ष, अर्धचन्द्र, अश्व, सिंह, स्वस्तिक, जलीय जन्तु और शिव के विभिन्न रूपों का प्रमुखता से अंकन होता था।

'सिक्कों की कहानी' का इतिहास

'सिक्कों की कहानी' छायाचित्र प्रदर्शनी में आरम्भिक खण्ड इन्हीं आहत मुद्राओं पर केन्द्रित है। आहत मुद्राओं के बाद भारत में इण्डो-ग्रीक शासन सन् 180 ईसा पूर्व से सन् 10 शती ई. तक दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र में रहा है। सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक मिनेन्दर था, जिसने अपनी राजधानी सियालकोट (पाकिस्तान) बनायी थी। इनकी कांस्य एवं रजत मुद्राओं के अग्र भाग में अधिकतर राजा का शीश एवं पृष्ठ भाग में देवी एथेना, पवित्र हाथी एवं ग्रीक एवं खरोष्ठी में लेख देखा जा सकता है। इसी तरह इण्डो पर्शियन शासकों के सिक्कों में राजा के चित्रण के अलावा अभिलेख में राजाओं के गुणगान एवं त्रिशूलधारी शिव का चित्रण महत्वपूर्ण है।

भारत में कुषाणों का शासन सन् 30 शती ईस्वी से 375 शती ईस्वी तक रहा है। इस राजवंश में कनिष्क प्रथम, वशिष्ठ एवं हुविस्क प्रसिद्ध शासक हुए। कुषाण-कालीन शासकों की मुद्राओं के अग्रभाग में जहाँ राजा को होम कुण्ड में हवन करते हुए या हाथी पर सवार दिखाया गया है, वहीं सिक्के के पृष्ठ भाग में महात्मा बुद्ध, कुषाण देवी नाना, वायु देव, समृद्धि की देवी, भगवान शिव का चित्र इस काल की स्वर्ण, रजत और कांस्य मुद्राओं का अंकन है।

प्रदर्शनी के अंतिम खण्ड में भारत के स्वर्ण युग कहे जाने वाले गुप्त काल के शासकों के स्वर्ण, रजत एवं कांस्य मुद्राओं के छायाचित्रों को सहेजा गया है। गुप्तकालीन सिक्के यह विशेषता लिये हुए है कि सिक्कों में राजा की चारित्रिक विशेषताएँ शूर-वीरता, कला-प्रेम, भक्ति-भाव आदि का चित्रण प्रभावी ढंग से किया गया है। मुद्राओं में महत्वपूर्ण यह भी है कि तात्कालीन राजाओं की मुद्राओं में देवी लक्ष्मी को महत्वपूर्ण स्थान दिये जाने से यह प्रमाणित होता है कि गुप्तकाल के शासक देवी लक्ष्मी के उपासक रहे होंगे।

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