भाषा के खतरे से जूझ रही पत्रकारिता

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Place: Bhopal                                                👤By: प्रतिवाद                                                                Views: 17969

24 दिसम्बर 2016, भारतीय पत्रकारिता भाषा के खतरे से जूझ रही है। समाचार माध्यमों में हिन्दी के बजाय बढ़ते अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग को लेकर यह चिंता है, राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों की। अवसर था, 'हिंदी पत्रकारिता: कल, आज और कल' विषय पर आयोजित संगोष्ठी का। अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के पांचवें स्थापना दिवस पर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के तत्वावधान में यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय सभागार में आयोजित किया गया था। हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उतार-चढ़ाव के साथ ही वर्तमान स्थिति व भविष्य की दशा-दिशा पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहनलाल छीपा की उपस्थिति में हुए इस समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत द्वारा की गई है। स्वदेश समूह के प्रधान संपादक राजेंद्र शर्मा शर्मा ने बीजा रोपण करते हुए काम-काज में मात्रभाषा की अनिवार्यता की जरूरत बताते हुए कहा, कि यह राष्ट्रीय चुनौती है। क्योंकि अब क्षेत्रीय भाषाओं में भी अंग्रेजी का खतरा बढ़ा है। वहीं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने विश्व हिन्दी सम्मेलन से पहले हिन्दी समाचार पत्रों की भाषा को लेकर कराए गए विश्लेषण का यह कहते हुए खुलासा किया कि, इनमें लगभग 15 हजार शब्द अंग्रेजी के इस्तेमाल किए जा रहे हैं। हालांकि उनका यह भी कहना था, कि अगले चार दशक तक हिन्दी पत्रकारिता को कोई नुकसान नहीं है। लेकिन खतरे में हिन्दी भाषा ही है।



सरकार की कथनी व करनी में अंतर

लोकमत समाचार के स्थानीय संपादक शिव अनुराग पटैरिया ने बतौर वक्ता हिन्दी की मौजूदा स्थिति के लिए शासन प्रशासन की कथनी व करनी में अंतर को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था, कि भारतीय पत्रकारों को मन में छिपी यह भ्रांति निकालनी होगी, कि अंग्रेजी के अखबार में आलेख लिखे बिना वह स्थापित नहीं हो सकते हैं।



शासक वर्ग अभी भी गुलामी में जी रहा है

राष्ट्रीय हिन्दी मेल के प्रधान संपादक विजय कुमार दास ने हिन्दी के प्रति बरती जा रही विमुखता के लिए अंग्रेजी की पक्षधर सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था, कि शासक वर्ग गुलामी को जी रहा है। अंग्रेजी अखबारों के लिए जहां सरकार रेड़ कार्पेट बिछा रही है। वहीं देश-प्रदेश के दूर-दराज में पहुंच रखने वाले हिन्दी अखबारों की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जितना कि अंग्रेजी अखबारों को महत्व दिया जाता है। शासन-प्रशासन की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत बताते हुए श्री दास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यह नसीहत दी है, कि विदेश यात्रा के दौरान राष्ट्रीय सम्मान के मद्देजनर अंग्रेजी के बजाय हिन्दी का प्रयोग करें।



बाजार की भाषा बने हिन्दी

हिन्दी भाषा में अंग्रेजी के बढ़ते दखल के पीछे बंसल टीवी के शरद द्विवेदी का तर्क था, कि यह बाजार की भाषा नहीं है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों से भाषण देने से भी मौजूदा स्थिति में सुधार होने वाला नहीं है। इसलिए जरूरत है, कि इसे रोजगार मूलक बनाया जाए। क्योंकि जब तक यह जब तक यह बाजार की भाषा नही बनेगी, तब तक यह काम नही कर पाएगी।



इंटरनेट में भी हो हिन्दी उपकरण

सुबह-सवेरे के कार्यकारी संपादक गिरीश उपाध्याय ने बतौर वक्ता अपनी बात रखते हुए कहा, कि इंटरनेट में हिन्दी का प्रभाव बढ़ा है। लेकिन उसको बढ़ावा देने के लिए उपकरणों की पर्याप्तता इसे बढऩे से रोक रही है। उन्होंने कहा, कि पत्रसूचना सहित कई विभागों द्वारा कई आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। बावजूद इसके यह नहीं बताया जाता है, कि कितने ऐसे ब्लाग और बेवसाइटें हैं, जहां हिन्दी लिखी जाती है और पढ़ी जाती है।



बाजार की भाषा बने लेकिन बाजारू नहीं

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार कैलाश चंद पंत ने कहा कि हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए भले ही बाजार की भाषा बनाया जाए। लेकिन इसके साथ यह ध्यान देने की जरूरत है, कि कहीं वह बाजारू न बन जाए। उन्होंने कहा कि, हिन्दी जन भाषा है। इसे बढ़ावा देने के लिए हमे स्वयं बदलना पड़ेगा। क्योंकि अंग्रेजी मानसिकता के बाजार का उद्देश्य देश की मानसिकता को बदलना है। यह सुनियोजित रूप से हो रहा है। यदि हमने बदलाव नही किया तो वैचारिक रूप से गुलाम हो जाएंगे।



अंग्रेजी में पढ़ो हिन्दी में गढ़ो

वरिष्ठ पत्रकार व एकता परिषद मप्र के उपाध्यक्ष महेश श्रीवास्तव ने कहा, कि नये लोग हिंदी की भाषा को आगे ले जाने की सीढिया है। भाषा चेतना उत्पन्न करती है। इसलिए अज्ञेय ने कहा है, कि अंग्रेजी में खूब पढ़ो लेकिन गढऩे का काम हिन्दी में करो। यह बात अलग है, कि सबल वर्ग ने पत्रकारिता को नियंत्रण में ले लिया और पत्रकार निरन्तर परतंत्र होता जा रहा है। वह इसलिए कि, नौकरी में जाने की चिंता में समझौता करने की शैली ने पत्रकारिता को नष्ट कर दिया है। पत्रकारिता कर्म से व्यवसाय में परिवर्तित होती चली जा रही है।



व्यवसाय की भाषा भी बनेगी हिन्दी

विवि के कुलपति मोहनलाल छीपा ने कहा, कि हिन्दी व्यवसाय की भाषा भी बनेगी। हिंदी रोजगार की भाषा कैसे बने, इसके लिए विवि प्रयास कर रहें है। उनका कहना था, कि वैश्विक के समय में हमारे पास ज्ञान का खजाना है, कि परोस ही नही पा रहे है। पढऩे के लिए हिंदी के माध्यम से यह नया उत्पाद है। विवि केस्थापना दिवस 25 दिसंबर के मद्देनजर आयोजित हिंदी बांचे हिंदुस्तान के तहत सभी से एक पेज हिन्दी का पढऩे की अपील भी की है।

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