
5 अप्रैल 2025। देवास के बागली तहसील के आदिवासी गांव परसपीपली में गणगौर पर्व ने एक बार फिर रोमांच, परंपरा और तड़के से भरे रंगों को समेटते हुए दस्तक दी है। यहां गणगौर महज देवी पूजन तक सीमित नहीं, बल्कि ये दिन है पतियों की पिटाई और सालभर का गुस्सा निकालने का! जी हां, सुनने में अजीब लगे पर परंपरा है बिल्कुल हटके!
🔸 गुड़ की पोटली, ढोल की गूंज और डंडों की धुन!
यहां की सबसे खास और अनोखी परंपरा है – “गुड़ तोड़ने की रस्म”! ऊंची लकड़ी पर नारियल और गुड़ की पोटली लटकाई जाती है और फिर शुरू होता है ‘पुरुष वर्सेस महिला’ का धमाकेदार खेल। पुरुष टोली ढोल-बाजे के साथ मैदान में उतरती है और कोशिश करती है कि पोटली उतार लें... लेकिन रुकिए! रास्ते में होती हैं डंडा लिए और गुस्से से तनी हुई महिलाएं, जो जमकर पिटाई करती हैं – अपने पति, भाई और हर उस पुरुष की जो पोटली छूने की कोशिश करता है।
"पति मारता है पूरे साल, आज पत्नी का नंबर है!"
गांव की बुजुर्ग महिला थावली बाई बेझिझक बताती हैं –
“जो भी मर्द साल भर में पत्नी को परेशान करता है, आज उसका हिसाब होता है। आज की मार पूरे 12 महीने की टेंशन की दवा है!”
गांव के सरपंच महादेव भी मुस्कुराते हुए बताते हैं –
“ये कोई झगड़ा नहीं, ये परंपरा है... प्रेम है, हंसी-मजाक है और महिलाओं का सशक्तिकरण भी! चोट भी लगे तो कोई बुरा नहीं मानता।”
🔸 गैडी बनी ढाल, पिटते-पिटते मुस्कुराए मर्द!
पुरुष बचने के लिए ‘गैडी’ यानी टी-शेप लकड़ी की ढाल लेकर आते हैं और अपने साथियों की रक्षा करते हैं। यह पूरा खेल 7 बार दोहराया जाता है – हर बार नई पोटली, नया रोमांच और नई पिटाई!
🔸 क्यों है ये खास?
गणगौर जहां एक ओर सुहागिनों का पर्व है, वहीं परसपीपली में यह महिला ऊर्जा, सामाजिक व्यंग्य और सांस्कृतिक स्पाइस का खजाना बन जाता है। इसे देखने दूर-दराज से सैकड़ों लोग इकट्ठा होते हैं और इस “गुड़ की जंग” का भरपूर लुत्फ उठाते हैं।