हिंदुत्व की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट नहीं करेगा विचार

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Place: नई दिल्ली                                                👤By: Digital Desk                                                                Views: 17762

25-अक्टूबर-2016, सुप्रीम कोर्ट ने फिलवक्त हिंदुत्व की व्याख्या करने से साफ मना कर दिया है। धर्म के आधार पर वोट देने की अपील करने की मनाही के कानूनी दायरे पर विचार कर रही सात जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को एक बार फिर साफ किया कि वे हिंदुत्व या धर्म के मुद्दे पर विचार नहीं करेंगे।



फिलहाल कोर्ट के सामने 1995 का हिंदुत्व का फैसला विचाराधीन नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें जो मसला विचार के लिए भेजा गया है, उसमें हिंदुत्व का जिक्र नहीं है। उनके समक्ष जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की व्याख्या का मामला भेजा गया है, जिसमें धर्म के नाम पर वोट मांगने को चुनाव का भ्रष्ट तरीका माना गया है। कोर्ट इसी कानून की व्याख्या के दायरे पर विचार कर रहा है।



1995 में हिंदुत्व को जीवन शैली बताया



दरअसल इस मामले की जड़ें नब्बे के दशक के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से जुड़ी है। जिसमें हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने के आधार पर बांबे हाई कोर्ट ने करीब दस नेताओं का चुनाव रद कर दिया था। हाई कोर्ट ने इसे चुनाव का भ्रष्ट तौर-तरीका माना था।



हालांकि 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय का यह फैसला पलट दिया था। उस फैसले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं बल्कि जीवनशैली है। इन्ही मामलों से जुड़ी भाजपा नेता अभिराम सिंह की याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित रह गई।



इसके अलावा मध्य प्रदेश के सुंदर लाल पटवा का मामला भी शीर्ष न्यायालय आया। दोनों ही में धर्म के आधार पर वोट मांगने का मसला शामिल है। जो तीन और पांच जजों की पीठ से होता हुआ सात न्यायाधीशों के पास पहुंचा है। जिस पर फिलहाल विचार हो रहा है।



समीक्षा की उठी मांग



हालांकि मंगलवार की सुबह सुनवाई की शुरूआत में ही मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात जजों की पीठ द्वारा स्थिति स्पष्ट कर दिए जाने के बावजूद कोर्ट के समक्ष 1995 के हिंदुत्व के फैसले पर समीक्षा की मांग उठती रही।



सुबह कुछ हस्तक्षेप याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कहा कि अगर कोर्ट 1995 के हिंदुत्व के फैसले पर विचार कर रहा है तो उन्हें भी सुना जाए। इस पर पीठ ने कहा कि वे हिंदुत्व या धर्म पर विचार नहीं कर रहे हैं। उनके समक्ष ये मसला विचाराधीन नहीं है। वे मुद्दे को और व्यापक नहीं करना चाहते।



उन्हें जो मुद्दा विचार के लिए भेजा गया है, वह धर्म के आधार पर वोट मांगने का है उसमें हिंदुत्व शब्द शामिल नहीं है। इसलिए फिलहाल वे उस पर विचार नहीं कर रहे। अगर आगे बहस के दौरान किसी ने कोर्ट को बताया कि रिफरेंस में ये मुद्दा भी शामिल है तो वे उसे सुनेंगे। इसके बाद धारा 123(3) के दायरे पर बहस होनी लगी।



पूरे मामले पर विचार करे पीठ



लंच के बाद एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील बीए देसाई ने फिर मुद्दा उठाया और कहा कि कोर्ट यह नहीं कह सकता कि उसके समक्ष हिंदुत्व का मसला नहीं है या वह उस पर विचार नहीं करेगा। कोर्ट के सामने जो अपीलें विचाराधीन हैं, उनमें यह मुद्दा शामिल है।



पीठ को पूरा मामला विचार के लिए भेजा गया है और कोर्ट को पूरे मामले पर तथ्यों के साथ विचार करना चाहिए। देसाई का कहना था, "मेरा मानना है कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के दायरे में हिंदू और हिंदुत्व आता है और कोर्ट को उस पर विचार करना चाहिए।



फिर उन्होंने चुनाव याचिका पर त्वरित सुनवाई के मुद्दे पर दलीलें रखीं। उनकी बहस कल भी जारी रहेगी। इस मामले में वैसे तो सिर्फ तीन याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, लेकिन राज्य सरकारों सहित कई हस्तक्षेप याचिकाकर्ताओं ने अर्जी दाखिल कर इस मुद्दे पर उन्हें सुने जाने की अपील भी की है।

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