
नामांकन आरंभ होने के ऐन पहले सत्तारूढ़ दल द्वारा देश के सर्वोच्च पद के चुनाव के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए, उम्मीदवारी पर विचार के लिए विशेषज्ञ महारथियों की टोली का गठन का मकसद इसकी ओट में कुछ और समय काटना है, यूं भी सत्ता पक्ष के सामने एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है जो लगभग एक पखवाड़े पूर्व संयुक्त विपक्ष द्वारा राष्ट्रपति चुनाव और उम्मीदवार को लेकर की गयी बैठक से काफी मिलती जुलती है, यह सही है कि निर्णायक खेल सत्ता और विपक्ष के बड़े घटक के बीच है लेकिन इसका अर्थ सियासी तमाशा भी नही होना चाहिए.
हाल में अरसे से सत्तारुढ़ दाल के करीबी सहयोगी दल ने चुनावी वादों को याद करते हुए सरकार को घेरने के साथ राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का नाम प्रत्याशी बनाये जाने के लिए लिया गया, सत्ता पक्ष की ओर से मोहन भागवत को उम्मीदवार बनाये जाने की स्थिति में उनकी जीत सुनिश्चित है इसमें कोई शक नही है. बहुत संभव है कि सियासी गलियारे में शोर शराबा यथा चुनावी बहिष्कार आदि की बाते खूब हो किंतु उनके खिलाफ कोई प्रत्याशी न खड़ा किया जाए और वे निर्विरोध चुने जाए.
प्रमुख विपक्ष और घड़ो के पास भी तपे तपाये लोगो की पूरी जमात है जिनका नाम सामने आने पर सता पक्ष उनकी आसानी के साथ अनदेखी नही कर सकता यदि विपक्ष एक राय होकर किसी उम्मीदवार का समर्थन करता है तो सत्ता पक्ष को जीत के लिए पसीने बहाने पड़ सकते है.
इसके पहले भी राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के लिए कई नाम खासी चर्चा में रहे है, जिनमे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान सबकी आंख का तारा बने अन्ना हजारे और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और काला धन मुहिम से लोगो के बीच एक खास जगह बनाने वाले बाबा रामदेव, विख्यात चिंतक गोविंदाचार्य का नाम ठंडे बस्ते में है आज भले ही उद्योगपति अडानी अम्बानी के नाम, सियासी हंसी बन चुके है किंतु उद्योग जगत के कई सितारे ऐसे है जिनका नाम आसानी से खारिज नही किया जा सकता है पारिवारिक पृष्ठभूमि और धाक के कारण उद्योग जगत के श्री रतन टाटा उनमे से एक है.
इससे इतर, सोशल मीडिया में जागरूक जनो ने सियासी अनैतिकता, अनिश्चतता और मोनोपल्ली के खिलाफ सियासी शुचिता और सुनिश्चितता की वापसी के लिए मुहिम छेड़ रखी है कई सुयोग्यजनो के नाम सामने आए है जिनमे प्रख्यात गांधीवादी राजनैतिक संत रघु ठाकुर प्रमुख है, सियासी दुनिया मे भी इसको लेकर हलचल है, वजह उनका बेदाग राजनीति जीवन और गहरी राजनैतिक पैठ हैं, हर दल में उनको जानने और सबंध रखने वालों की कमी नही है, सोशल मीडिया पर लोगो ने दलीय भावना से ऊपर उठकर खुले आम, कारण गिनवाते हुए अपनी पसंद का इज़हार किया है, अधिकांश सांसद व विधायक उनसे भली भांति परिचित है, बेशक सांसद विधायको की निष्ठा अपने दल के प्रति हो लेकिन सबकी दूसरी पसंद श्री रघु ठाकुर बन सकते है यही मत ( वोट) बिंदु सत्ता और विपक्ष का राजनैतिक धर्मसंकट है जिसके कथित सियासी आका बचना चाहेगे अन्यथा देश की सड़कें भी उन्हें उतना ही जानती है जितना वे देश की सड़कों को जानते है.
कतिपय ताकतवर सियासी समूह का सबसे बड़ा विचलन यही है कि मोहन भागवत या रघु ठाकुर या रतन टाटा हो इनकी वैचारिक धारा अलग हो सकती है लेकिन इनमे कोई भी रबड़ स्टाम्प नही है शायद यही मजबूरी तेरी नजर - मेरी नजर, तेरा पत्ता - मेरा पत्ता जैसे ओट की वजह है और यह खेल खींच तान कर तब तक चलाया जाता रहेगा जब तक कथित स्थापित सियासी शक्तियों की पसंद को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प, किसी के पास न बचे. अन्यथा कोई कारण नही है कि राष्ट्रपति पद के योग्य प्रभावी लोगो के नाम सामने आने के बाद भी उनमे से किसी को उम्मीदवार न बनाया जाये.
- जावेद उस्मानी